निष्क्रिय इच्छामृत्यु का कानूनी ढांचा भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का मुद्दा 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद चर्चा में आया था। न्यायालय ने 'लिविंग विल' या 'एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव' को कानूनी मान्यता दी थी, जिसके तहत एक सक्षम व्यक्ति यह लिखित निर्देश दे सकता है कि यदि वह भविष्य में ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां उपचार का कोई लाभ न हो, तो उसे कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणालियों पर न रखा जाए। वर्तमान में, इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए मजिस्ट्रेट की उपस्थिति और अस्पताल की समिति की मंजूरी जैसे कई स्तरों से गुजरना पड़ता है।
वर्तमान कानूनी चुनौतियां याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मौजूदा प्रक्रिया अत्यधिक जटिल और समय लेने वाली है, जिससे उन रोगियों और उनके परिवारों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है जो पहले से ही गंभीर मानसिक और शारीरिक पीड़ा में हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों के अनुसार, प्रक्रिया में सुधार के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है: - लिविंग विल के पंजीकरण की प्रक्रिया को डिजिटल और सुलभ बनाना। - मेडिकल बोर्ड के गठन और निर्णय लेने की समय-सीमा को स्पष्ट करना। - डॉक्टरों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना ताकि वे बिना किसी भय के निर्देशों का पालन कर सकें।
चिकित्सा और नैतिक दृष्टिकोण चिकित्सा जगत में इस विषय पर बहस जारी है कि जीवन के अंतिम चरण में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार कैसे सुनिश्चित किया जाए। कई डॉक्टर इस बात पर जोर देते हैं कि उपचार वापस लेना (Withdrawal of treatment) और सक्रिय रूप से मृत्यु को आमंत्रित करना (Active euthanasia) दो अलग-अलग चीजें हैं। भारतीय कानून में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति है, जहां जीवन रक्षक प्रणालियों को हटाया जाता है, न कि किसी दवा के माध्यम से जीवन समाप्त किया जाता है।
भविष्य की दिशा सर्वोच्च न्यायालय अब यह तय करेगा कि क्या मौजूदा दिशानिर्देशों में संशोधन की आवश्यकता है ताकि नागरिकों के लिए अपनी अंतिम इच्छा को प्रभावी ढंग से लागू करना आसान हो सके। सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय से इस मामले में जवाब मांगा गया है। यह निर्णय न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक और नैतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि यह जीवन के अधिकार और गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है।