मां कूष्माण्डा की पूजा का महत्व नवरात्रि के पावन पर्व पर देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्माण्डा की आराधना का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कूष्माण्डा ने ही अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी, जिसके कारण उन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा माना जाता है।
पूजा और आरती की विधि भक्त इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। पूजा स्थल पर मां कूष्माण्डा की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उन्हें अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। पूजा के अंत में मां कूष्माण्डा की आरती की जाती है, जो देवी की कृपा प्राप्त करने का एक प्रमुख माध्यम मानी जाती है।
आरती का धार्मिक स्वरूप मां कूष्माण्डा की आरती के दौरान भक्त उनके स्वरूप का ध्यान करते हैं। उनकी अष्ट भुजाएं हैं, जिनमें वे कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र, गदा और जपमाला धारण करती हैं। आरती के माध्यम से भक्त देवी से अपने जीवन में शांति और स्वास्थ्य की प्रार्थना करते हैं। - पूजा में कुम्हड़े (पेठा) का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है। - देवी को प्रसन्न करने के लिए लाल रंग के पुष्प अर्पित किए जाते हैं। - आरती के समय शुद्ध घी का दीपक जलाना शुभ माना जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण ज्योतिष शास्त्र और आध्यात्मिक ग्रंथों में मां कूष्माण्डा को सूर्य मंडल की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। कहा जाता है कि उनकी उपासना से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है और स्वास्थ्य संबंधी बाधाएं दूर होती हैं। नवरात्रि के दौरान देश भर के मंदिरों में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जहां भक्त सामूहिक रूप से आरती में सम्मिलित होते हैं। यह दिन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह आत्मिक शांति और अनुशासन का मार्ग भी प्रशस्त करता है।